भयानक होगा जनसंख्या विस्फोट
— हेमचंद्र सकलानी-
विकासनगर: सन 1947 1962 1965 1971 और फिर 1999 में विदेशी शक्तियों का आक्रमण हमारे देश पर हुआ अपार जनधन की हानि देश को उठानी पड़ी थी। यह आक्रमण हमें बाहरी तौर पर तो विचलित कर गए थे परंतु हमारी आस्था विश्वास हिम्मत हौसलों हमारी संस्कृति सभ्यता को नहीं तोड़ सके थे। लेकिन बढ़ती आबादी भूख प्यास बेरोजगारी अन्य अत्याचार रूल पाट गुंडागर्दी का विस्फोट जिस दिन होगा उस दिन हमारी सारी व्यवस्थाएं शासन प्रशासन कानून धरे के धरे रह जाएंगे। हम विदेशी शक्तियों का सामना करने में तो सक्षम हो सकते हैं पर जनसंख्या की अपार वृद्धि के कारण अपनों के कारण जो आक्रमण देश पर हो रहे हैं उसके कालांतर में जो दुखद परिणाम निकलेंगे उन्हें हमें भुगतना ही होगा। इसकी छोटी सी झलक कुछ वर्ष पूर्व में भरतपुर दरभंगा नागपुर, शाहीनबाग आंदोलन, किसान आन्दोलन,और कुछ दिन पूर्व बंगाल में जो दिखाई वो संकेत हैं। कुछ समय पूर्व जहां बेरोजगारी की मार से त्रस्त युवकों ने मुंबई राजस्थान पंजाब में जातिवाद को लेकर फिर उदंडित भीड़ के रूप में लोगों ने जमकर उत्पात मचाए हो यह जनसंख्या विस्फोट का छोटा सा नमूना ही था।
स्वतंत्रता मिलते समय देश की जनसंख्या 30 करोड़ थी आज 75 वर्ष बाद डेढ़ अब के करीब यह आंकड़ा पहुंच चुका है। हमारी 1947 की शांति सभ्यता संस्कृति ईमानदारी आस्था विश्वास प्रेम स्नेह सौहार्द के पर्यावरण की शुद्धता सुंदरता में जो गिरावट आई वह बढ़ती जनसंख्या के परिणाम स्वरुप ही आयी है। सन 2035 तक यदि यह जनसंख्या का आंकड़ा दो अरब की सीमा को पार कर जाए तो आश्चर्य न होगा। फिर जनसंख्या विस्फोट का जो परिणाम होगा वह हमारे कल्पनाओं से बाहर होगा।
स्वाधीनता के समय देश घने जंगलों, प्रकृति की हरियाली, स्वच्छ शुद्ध सुंदर पर्यावरण से परिपूर्ण था। बेरोजगारी की समस्या क्या होती है कोई जानता नहीं था। अपराध के गिने चुने ही हुआ करते थे। सुंदर हरे-भरे खेत, चाय के बागान, हर और लहलहाते दिखाई पड़ते थे। इनका स्थान अब कंक्रीट के जंगलों से भर गया है। विशाल वृक्षों की जगह अब मल्टी स्टोरी बिल्डिंग खड़ी हो चुकी हैं,खेत खलिहान बाग बगीचे मैदान अब मिल कारखाने, कालोनियों, सड़कों की भेंट चढ़ चुके हैं। शहरों में फूलों के बाग जो शहर की जान हुआ करते थे सुंदरता के प्रतिबिम्ब हुआ करते थे उनका अस्तित्व समाप्त हो गया है। सड़कों पर सुबह से देर रात तक दौड़ता मानवों का हुजूम लगता है चीटियों कौकरोचौं के झुंड के झुंड गुजर रहे हैं। मुंबई के चर्चगेट के बारे में तो मशहूर है कि वहां से बाहर निकलते लोगों की भीड़ भीड़ नहीं लगती वरना ऐसा लगता है जैसे मुंबई शहर मुंह खोलकर मनुष्यों की उल्टी कर रहा हो।
1970 के बाद विश्व में बढ़ती जनसंख्या का कारण विश्व के सारे देश चिंतित हो उठे थे। तब संयुक्त राष्ट्र संघ ने 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस घोषित किया। यूनेस्को में गंभीरता से बढती जनसंख्या पर विचार विमर्श हुआ तथा जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए विश्व के सभी देशो को प्रयास करने के लिए कहा गया। फल स्वरुप विश्व के 95% देशों ने जनसंख्या वृद्धि के विस्तार को रोकने में सफलता प्राप्त की है।
चीन के एक अरब 25 करोड़ जनसंख्या के अनुपात में 95 लाख 97 हजार स्क्वायर किलोमीटर भूमि है, रूस में 27 करोड़ की जनसंख्या के अनुपात में 17 करोड़ 75000 स्क्वायर किलोमीटर भूमि है, अमेरिका में साडे 26 करोड़ की आबादी के अनुपात में 90 लाख 73000 स्क्वायर किलोमीटर भूमि है। इन सभी देशों ने विशेष कर अमेरिका रूस ने अपनी जनसंख्या को 50 वर्ष बाद भी काफी नियंत्रण में रखा है इसके विपरीत हमारी एक अरब पचास करोड़ की आबादी के अनुपात में भूमि मात्र 32 लाख 87000 स्क्वायर किलोमीटर भूमि है। चीन के पास हमारे अनुपात में तीन गुनी अधिक भूमि है अमेरिका के पास भी इतनी ही भूमि है। चीन गत 50 वर्षों में अपनी आबादी को दुगना करने के बाद रुक गया, उसके सीमा क्षेत्र में भू भाग में बढ़ोतरी हुई परंतु हम इन 75 वर्ष में अपने से चार गुना से अधिक होने जा रहे हैं।
क्षेत्रफल के मामले में चीन पाकिस्तान ने हमारे देश का काफी हिस्सा हड़प लिया है जिससे हमारे देश का क्षेत्रफल भी कम हुआ। साम्यवादी कठोर शासन के अंतर्गत रूस चीन की सभ्यता संस्कृति सामाजिक व्यवस्था में कोई बदलाव इन 50 वर्षों के बाद भी नहीं आ पाया नहीं. जनसंख्या के दबाव से वहां के पर्यावरण पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ा। इसके विपरीत जनसंख्या का दुष्प्रभाव हमारे देश पर कहर बन कर बरपा। हमारी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति,परंपराएं, रीति रिवाज, मान्यताएं, आस्थाएं, जिनके कारण पूरे विश्व में हमारा देश जाना जाता था आज समाप्ति के कगार पर हैं। बढ़ती जनसंख्या ने तेज गति से बढ़ती बेरोजगारी को जो सारे अपराधों की जननी है कोई जन्म दिया है। यही कारण है कि देश के सारे अखबार न्यूज चैनल की खबरें अपराधी कारनामों से प्रतिदिन भरे रहते हैं। यह हाल तब है जबकि 80% अपराधों के रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती है।
खेतों की जमीन निरंतर कम होते रहने से अनाज के उत्पादन पर असर पाड़ना ही था परंतु यूरिया के अत्यधिक प्रयोग से इसे बढ़ाने में सफलता प्राप्त हो रही है जो मानव के स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डाल रहा है। आने वाले 25 वर्षों में इतनी विशाल आबादी के लिए न तो हम स्कूल बना पाएंगे, न चिकित्सालय, न ही उन्हें रोजगार उपलब्ध करा पाएंगे। भूमि की उर्वरक क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। आधुनिकता की दौड़ में यदि हमने प्लास्टिक की रोटी नायलॉन का पानी बना भी लिया तो वह मनुष्य भूख प्यास को मिटा नहीं पाएगा।
कई दशक गुजरने के बाद भी अमेरिका की जनसंख्या 35 करोड़ के लगभग, इंडोनेशिया की 29 करोड़, पाकिस्तान की 26 करोड़, बंगलादेश की 18 करोड़, रूस की 15 करोड़, जापान की 12 करोड़, जर्मनी की 8 करोड़, इंग्लैंड की 7 करोड़ के लगभग है मतलब इन आठ देशों के बराबर हमारे भारत की जनसंख्या है उस अनुपात मे भूमि का स्तर बेहद चिंतनीय है जो जनसंख्या के लिए भयंकर एक दिन सिद्ध हो सकता है नहीं, बल्कि होगा.
बढ़ती जनसंख्या के कारण ध्वनि प्रदूषण गैसीय, प्लास्टिक, पॉलिथीन, जलवायु, तथा अत्यधिक वाहनों में डीजल पेट्रोल के उपयोग के कारण तथा सामाजिक एवं मानवीय प्रदूषण बढ़ने के कारण जो वायुमंडल के साथ-साथ संपूर्ण माननीय मानवीय जीवन को प्रदूषित करेगा, मिल कारखाने सड़कों मकान शहर कस्बों की सारी गंदगी नदियों,तालाबों, नहरों में तथा भूमि के गर्भ में जाएगी जो पीने के पानी को जहरीला बनायेगी। पर्यावरण प्रदूषण इतना बढ़ जाएगा कि मास्क लगाने पर भी मनुष्य के जीवन को खतरा बना रहेगा। मानव समाज अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो जाएगा।
जब आज बच्चों को युवकों को स्कूल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल पा रहा, उन्हें रोजगार नहीं मिल पा रहा तब 25 वर्ष बाद की स्थिति क्या होगी हम कल्पना भी करना चाहे तो नहीं कर सकेंगे।भूख प्यास,बेरोजगारी,बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण का प्रदूषण, सभ्यता संस्कृति कर गिरता स्तर, आपराधिक मनोवृत्ति के लोगों की बड़ी बढ़ती जनसंख्या, शासन प्रशासन का भ्रष्टाचारी स्वरूप, हमारी प्राचीन सभ्यता संस्कृति और शांति व्यवस्था की धज्जियां उड़ा देंगे। देश में तब नागरिक नहीं रहेंगे सिर्फ भीड़ रहेगी हर जगह। इतिहास गवाह है कि भीड़ का न कोई आदर्श होता है, न उद्देश्य होता है, न सिद्धांत होता है, न नियम होता है। होता है ना उसकी कोई सभ्यता होती है ना उसकी कोई संस्कृति होती है, न उसका कोई कानून होता है। उसका सिर्फ जुनून होता है उसका सिर्फ पागलपन होता है और यह सब आज हर और दिखाई पड़ रहा है।
बढ़ती आबादी के साथ जब जातिवाद धर्मवाद मिल जाएंगे, जब राजनीतिक स्वार्थों के लिए इनका उपयोग होने लगेगा तब उसका आक्रमण बाहरी आक्रमण से कई गुना अधिक दुखदाई होगा। जनसंख्या वृद्धि से जहां हानियां ही हानियां है वहीं राजनीतिक मानसिकता वालों को लाभ ही लाभ है इससे उनका वोट बैंक बढ़ेगा, जनता के बीच में वैमनस्यता को अधिक स्तर तक फैलाया जा सकेगा। अफवाहों का वार पहले से कहीं घातक होगा। लोकसभा विधानसभाओं की सीटों में बढ़ोतरी होगी, तब हर गली का एक एम एल ए, हर मोहल्ले का एक एम.पी और कहीं गई तो मंत्री होंगे। अब जनसंख्या वृद्धि रोकने का समय हाथ से निकल गया है अब समय आ गया है कि हम जनसंख्या कम करने के बारे में सोचें गंभीरता से सोचें। भारत जैसे भौगोलिक क्षेत्र वाले देश के लिए आदर्श जनसंख्या ज्यादा से ज्यादा 50 करोड़ हो सकती है, इससे अधिक की जनसंख्या वरदान नहीं अंततः अभिशाप साबित हो सकती है। देश की, समाज की, शांति सुरक्षा समृद्धि के लिए मात्र यही एक शर्त शेष है की जनसंख्या कम करने के लिए कदम उठाए जाएं।
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