क्षणिक लोकप्रियता की दौड़ में सिमटता साहित्यिक मूल्य
तथाकथित कवि/कवयित्रियाँ सतही या बनावटी पंक्तियों के सहारे साहित्य का आवरण ओढ़कर, मूलतः आकर्षण-केन्द्रित प्रस्तुति को बढ़ावा दे रही हैं। जहाँ कविता संवेदनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति होनी चाहिए, वहीं उसे कई बार केवल ध्यान खींचने का माध्यम…