रासायनिक कृषि का आशाजनक विकल्प बनकर उभरी प्राकृतिक खेती
प्राकृतिक कृषि रासायनिक कृषि का एक आशाजनक विकल्प बनकर उभरी है। हरित क्रांति के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के बावजूद रासायनिक कृषि ने मृदा स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाया है और छोटे किसानों के लिए लागत बढ़ा दी है। प्राकृतिक खेती एक टिकाऊ कृषि पद्धति है जो रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और गहन जुताई से बचती है और मिट्टी की उर्वरता और फसल की वृद्धि के लिए पारिस्थितिक प्रक्रियाओं और स्थानीय संसाधनों पर निर्भर करती है। इसमें कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता है। मृदा संवर्धन के लिए जीवामृत, बीजामृत और पंचगव्य का उपयोग किया जाता है। मिट्टी की जैव विविधता को बनाए रखने के लिए जुताई या खेत जोतने की आवश्यकता नहीं होती है। मिट्टी की नमी बनाए रखती है और कटाव को रोकती है। प्राकृतिक खेती कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों को समाप्त करती है, जिससे सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को बढ़ावा मिलता है, मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। यह भूमि क्षरण को रोकता है, जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की 30 प्रतिशत भूमि पहले से ही गहन रासायनिक उपयोग के कारण खराब हो चुकी है। प्राकृतिक खेती मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता सुनिश्चित करती है, जिससे बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम हो जाती है। प्राकृतिक खेती जल की खपत कम करती है और सूखे से निपटने की क्षमता बढ़ाती है। यह पद्धति खेती की लागत कम करती है और किसानों की लाभप्रदता बढ़ाती है। प्राकृतिक खेती वायवीय मिट्टी की स्थितियों को बनाए रखकर और कृत्रिम उर्वरकों से बचकर मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन को कम करती है। इसके अलावा, जलवायु अनुकूलन के लिए भी इसका महत्व है। एक ही फसल पर आधारित रासायनिक खेती के विपरीत, प्राकृतिक खेती बहु-फसली, कृषि वानिकी और अंतरफसल को प्रोत्साहित करती है, जिससे खाद्य विविधता और पोषण सुरक्षा बढ़ती है। प्राकृतिक खेती ज्ञान और श्रम प्रधान है, जिसके लिए किसानों को खाद बनाने, मल्चिंग करने और फसल चक्र जैसी तकनीकों में संलग्न होने की आवश्यकता होती है, जिससे ग्रामीण रोजगार सृजित होता है। अपने पर्यावरणीय लाभों के बावजूद, विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में इसकी स्थिरता को साबित करने वाले बड़े पैमाने पर, दीर्घकालिक वैज्ञानिक अध्ययनों का अभाव है।
प्राकृतिक खेती में अक्सर शुरुआती पैदावार में गिरावट आती है, खासकर चावल, गेहूं और गन्ना जैसी अधिक लागत वाली फसलों में , जिससे किसानों को अल्पकालिक लाभ कम मिलता है। पारंपरिक खेती के विपरीत, जिसमें रासायनिक इनपुट के साथ उच्च उत्पादन सुनिश्चित किया जाता है, एनएफ जैविक मृदा संवर्धन पर निर्भर करता है, जिसके परिणाम दिखने में समय लगता है। यह अनिश्चितता किसानों को परिवर्तन करने से हतोत्साहित करती है, खासकर खाद्य सुरक्षा पर निर्भर क्षेत्रों में।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए जीएम फसलों पर रोक लगानी होगी। प्राकृतिक खेती एवं जीएम फसलों में परस्पर विरोध है। जी.एम. फसलों के विरोध का एक मुख्य आधार यह रहा है कि यह फसलें स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं तथा इनका असर जेनेटिक प्रदूषण के माध्यम से अन्य सामान्य फसलों एवं पौधों में फैल सकता है। जी.एम. फसलों एवं गैर जी.एम. फसलों का सह अस्तित्व नहीं हो सकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि जी.एम. फसलों की सुरक्षा या सेफ्टी प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसके विपरीत पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हो चुके हैं जिनसे इन फसलों की सेफ्टी या सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की क्षति होगी जिसकी पूर्त्ति नहीं हो सकती है, जिसे फिर ठीक नहीं दिया जा सकता है। जीएम फसलों से जुड़े खतरे का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष कई वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि जो खतरे पर्यावरण में फैलेंगे उन पर हमारा नियंत्रण नहीं रह जाएगा तथा इनके बहुत दुष्परिणाम सामने आने पर भी हम इनकी क्षतिपूर्त्ति नहीं कर पाएंगे। जेनेटिक प्रदूषण का मूल चरित्र ही ऐसा है। वायु प्रदूषण एवं जल प्रदूषण की गंभीरता पता चलने पर इनके कारणों का पता लगाकर उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं, पर जेनेटिक प्रदूषण जो पर्यावरण में चला गया वह हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाता है। जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रचार कई बार इस तरह किया जाता है कि किसी विषिष्ठ गुण वाले जीन का ठीक-ठीक पता लगा लिया है एवं इसे दूसरे जीव में पहुंचाकर उसमें वही गुण उत्पन्न किया जा सकता है। किन्तु हकीकत इससे अलग एवं कहीं अधिक पेचीदी है। कोई भी जीन केवल अपने स्तर पर या अलग से कार्य नहीं करता है अपितु बहुत से जीनों के एक जटिल समूह के एक हिस्से के रूप में कार्य करता है। इन असंख्य अन्य जीनों से मिलकर एवं उनसे निर्भरता में ही जीन के कार्य को देखना-समझना चाहिए, अलगाव में नहीं। एक ही जीन का अलग-अलग जीव में काफी भिन्न असर होगा, क्योंकि उनमें जो अन्य जीन हैं वे भिन्न हैं। विषेषकर जब एक जीव के जीन को काफी अलग तरह के जीव में पहुंचाया जाए तो, जैसे मनुष्य के जीन को सूअर में, तो इसके काफी नए एवं अप्रत्याषित परिणाम होने की संभावना है। इतना ही नहीं, जीनों के समूह का किसी जीव की अन्य शारीरिक रचना एवं बाहरी पर्यावरण से भी संबंध है। जिन जीवों में वैज्ञानिक विषेष जीन पंहुचाना चाह रहे हैं, उनसे अलग जीवों में भी इन जीनों के पंहुचने की संभावना रहती है जिसके अनेक अप्रत्याषित परिणाम एवं खतरे हो सकते हैं। बाहरी पर्यावरण जीन के असर को बदल सकता है एवं जीन बाहरी पर्यावरण को इस तरह प्रभावित कर सकता है जिसकी संभावना जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग करने वालों को नहीं थी। एक जीव के जीन दूसरे जीव में पंहुचाने के लिए वैज्ञानिक जिन तरीकों का उपयोग करते हैं उनसे अप्रत्याषित परिणामों एवं खतरों की संभावना और बढ़ जाती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग के अधिकांष महत्वपूर्ण उत्पादों के पेटेंट बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हैं एवं वे अपने मुनाफे को अधिकतम करने के लिए इस तकनीक का जैसा उपयोग करती हैं, उससे इस तकनीक के खतरे और बढ़ जाते हैं। कृषि एवं खाद्य क्षेत्र में जेनेटिक इंजीनियरिंग की टैक्नालाजी मात्र लगभग छः-सात बहुराष्ट्रीय कंपनियों (उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथ में केंद्रित हैं। इन कंपनियों का मूल आधार पश्चिमी देशों में है। इनका उद्देश्य जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से विश्व कृषि एवं खाद्य व्यवस्था पर ऐसा नियंत्रण स्थापित करना है जैसा विश्व इतिहास में आज तक संभव नहीं हुआ है