केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की सीमाएं और सवाल
(जब जांच एजेंसी बन जाए राजनीति का केंद्र बिंदु)
-डॉ. प्रियंका सौरभ–
भारत के संघीय ढांचे में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का राज्य क्षेत्राधिकार एक ऐसा संवेदनशील और बहुपरतीय मुद्दा बन चुका है, जो केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक, संवैधानिक और नैतिक प्रश्नों को भी अपने भीतर समेटे हुए है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह विभिन्न राज्यों—विशेषकर विपक्षी शासित राज्यों—ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति (जनरल कंसेंट) वापस ली है, उसने इस बहस को और अधिक तीखा बना दिया है। यह सवाल बार-बार उठाया जा रहा है कि क्या सीबीआई वास्तव में एक निष्पक्ष जांच एजेंसी है या फिर वह केंद्र सरकार के प्रभाव में काम करने वाली संस्था बनती जा रही है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का यह दावा है कि राज्य सरकारें अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार जांच एजेंसियों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर रही हैं। सच इन दोनों अतियों के बीच कहीं स्थित है।
सीबीआई की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को समझने के लिए दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम, 1946 (डीएसपीई अधिनियम) को समझना आवश्यक है। यही वह कानून है जो सीबीआई को वैधानिक आधार प्रदान करता है। इस अधिनियम की धारा 6 स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी राज्य में सीबीआई को अपनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए संबंधित राज्य सरकार की सहमति आवश्यक होगी। यही प्रावधान भारतीय संघवाद की उस भावना को दर्शाता है, जिसमें राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान किया गया है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यह सहमति पूर्ण और अपरिहार्य नहीं है। कानून में ऐसे कई अपवाद मौजूद हैं, जहां सीबीआई बिना राज्य की सहमति के भी जांच कर सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी मामले में उच्चतम न्यायालय या संबंधित उच्च न्यायालय सीबीआई जांच का आदेश देता है, तो राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार के कर्मचारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में, या केंद्रीय कानूनों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में भी सीबीआई को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है। वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय इस संदर्भ में उल्लेखनीय है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने के लिए राज्य की सहमति आवश्यक नहीं है। यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि राज्य की शक्ति सीमित है और उसे राष्ट्रीय हित तथा न्यायिक प्रक्रिया के सामने झुकना पड़ सकता है।
भारतीय संविधान का संघीय ढांचा भी इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत को एक “सहकारी संघवाद” का उदाहरण माना जाता है, लेकिन यह पूर्णतः विकेंद्रीकृत नहीं है। सातवीं अनुसूची में कानून-व्यवस्था को राज्य सूची में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि सामान्य परिस्थितियों में यह राज्यों का विषय है। लेकिन अनुच्छेद 246 और 254 के तहत केंद्र को विशेष परिस्थितियों में प्रधानता प्राप्त है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि राष्ट्रीय एकता और कानून का शासन किसी भी स्थिति में कमजोर न पड़े।
यहीं से यह टकराव उत्पन्न होता है। एक ओर राज्य अपनी संवैधानिक स्वायत्तता का हवाला देते हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र यह तर्क देता है कि राष्ट्रीय हित और व्यापक न्याय व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए उसके पास हस्तक्षेप करने का अधिकार होना चाहिए। 2018 के बाद से पश्चिम बंगाल, पंजाब, तेलंगाना, केरल, झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और अन्य कई राज्यों ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है। सामान्य सहमति का अर्थ होता है कि सीबीआई राज्य में बिना हर बार अनुमति लिए जांच शुरू कर सकती है। इसकी वापसी के बाद सीबीआई को हर मामले में अलग से अनुमति लेनी पड़ती है, जिससे जांच प्रक्रिया धीमी और जटिल हो जाती है।
राज्यों का आरोप है कि केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए करती है। कई मामलों में यह आरोप लगाया गया है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ अचानक जांच शुरू हो जाती है, जबकि सत्ता पक्ष के नेताओं के मामलों में ढिलाई बरती जाती है। पश्चिम बंगाल सरकार ने 2019 में सामान्य सहमति वापस लेते समय इसी प्रकार की चिंता व्यक्त की थी। इसी तरह अन्य राज्यों ने भी इसे अपनी स्वायत्तता की रक्षा का कदम बताया।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का यह कहना है कि राज्य सरकारें सहमति रोककर भ्रष्टाचार और अपराध की जांच में बाधा डाल रही हैं। यदि हर मामले में राजनीतिक अनुमति की आवश्यकता होगी, तो निष्पक्ष जांच संभव नहीं हो पाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2021 में इस प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी और कहा था कि राज्यों द्वारा सामान्य सहमति वापस लेने से अंतरराज्यीय और जटिल अपराधों की जांच प्रभावित होती है। यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि व्यापक न्यायिक हितों के संदर्भ में देख रही है।
इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इससे जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है। जब किसी जांच एजेंसी पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते हैं, तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि सीबीआई को एक निष्पक्ष और स्वतंत्र संस्था के रूप में नहीं देखा जाएगा, तो उसके द्वारा की गई जांच और कार्रवाई भी संदेह के घेरे में आ जाएगी।
इसके साथ ही, राज्यों द्वारा सहमति वापस लेने की प्रवृत्ति भी एक खतरनाक उदाहरण प्रस्तुत करती है। यदि हर राज्य अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार केंद्रीय एजेंसियों को प्रवेश से रोकने लगे, तो राष्ट्रीय स्तर पर अपराध नियंत्रण और भ्रष्टाचार विरोधी प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं। विशेष रूप से ऐसे अपराध जो कई राज्यों में फैले होते हैं, उनकी जांच के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी की आवश्यकता होती है।
समाधान इस टकराव में नहीं, बल्कि संतुलन और सहयोग में निहित है। सबसे पहले, यह आवश्यक है कि सीबीआई की स्वायत्तता को वास्तविक रूप से सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है और एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किया जा सकता है, जिसमें न्यायपालिका और विपक्ष की भी भागीदारी हो। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सीबीआई किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर कार्य करे।
दूसरे, डीएसपीई अधिनियम में संशोधन कर एक स्पष्ट और संतुलित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। इसमें यह प्रावधान किया जा सकता है कि राज्य सरकारें सहमति देने या न देने के लिए एक निश्चित समय सीमा के भीतर निर्णय लें। यदि निर्धारित समय में कोई निर्णय नहीं लिया जाता, तो उसे स्वीकृति माना जाए। इससे जांच प्रक्रिया में अनावश्यक देरी को रोका जा सकता है।
तीसरे, अंतरराज्यीय परिषद जैसी संस्थाओं को सक्रिय किया जाना चाहिए, ताकि इस प्रकार के विवादों का समाधान संवाद के माध्यम से किया जा सके। सहकारी संघवाद का वास्तविक अर्थ यही है कि केंद्र और राज्य मिलकर समस्याओं का समाधान करें, न कि एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हों।
अंततः, यह समझना आवश्यक है कि सीबीआई का अधिकार क्षेत्र केवल एक कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा भी है। यदि केंद्र और राज्य दोनों अपने-अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझें, तो इस विवाद का समाधान संभव है। न तो पूर्ण केंद्रीकरण उचित है और न ही पूर्ण विकेंद्रीकरण। एक संतुलित, पारदर्शी और सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही इस समस्या का स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है।
जब तक यह संतुलन स्थापित नहीं होता, तब तक सीबीआई का अधिकार क्षेत्र संघवाद और केंद्रीकरण के बीच खींचतान का प्रतीक बना रहेगा। लेकिन यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत सुधारों के माध्यम से इस दिशा में प्रयास किए जाएं, तो यह विवाद न केवल सुलझ सकता है, बल्कि भारतीय संघीय ढांचे को और अधिक मजबूत भी बना सकता है।